रविवार, 23 मई 2010
मीडिया के जिस चमक धमक से हम इतना चकाचौंध हो जाते हैं . हमें अपने टेलिवीजन स्क्रिन पर किसी एंकर को देखकर उसकी बातें सुनकर ये लगता है की वाह ये व्यक्ति समाज के लिए कितना कुछ कर रहा है लेकिन क्या आपने इस मीडिया के अंदर घुस कर इसे जानने की कोशिश की है की है कि चौबीसो घंटे टीवी पर बकर बकर करने वाला ये पत्रकार किन किन राहों से होकर गुजरते है ...समाज सुधार का राग अलापने वाली ये मीडिया जो आए दिन छोटी छोटी गलतियों पर नेताओं या किसी भी आम आदमी की धज्जियां उड़ा देती है अपने ही ऑरगनाइजेशन में काम कर रहे लोगों का कितना शोषण करती है..क्या आपने कभी जानने की कोशिश की कि लोगों के लिए हक की लड़ाई लड़ने वाले ये मीडियाकर्मी खुद अपने साथ हो रहे अन्यायों के खिलाफ कभी आवाज भी उठा पाते हैं या नहीं क्या आपने कभी सोचा की में किसी के भी प्रोबलम को मुद्दा बना कर एक छोटे से बॉक्स के सहारे दुनिया के सामने खड़े हो कर चिल्ला चिल्ला कर किसी व्यक्ती विशेष के प्रोब्लम को अपनी आवाज देकर दुनिया को जगा देने वाला ये पत्रकार खुद अपने लिए अंदर से कितने कुंठीत हैं कभी अपनी लड़ाई भी लड़ पाते है या नही....कभी इसकी समस्याएं टीवी के सामने क्यों नहीं आती हैं ...और सिर्फ इसकी ही क्यों किसी भी खबरीया चैनल में न जाने और भी कितने लोग काम करते हैं जो करना कुछ और चाहते हैं लेकिन उन्हें करना कुछ और पड़ता है वो भी इंटर्नशीप के नाम पर मुफ्त में बाद में अगर रो पीट कर और अपने सिद्धांतों के साथ कुछ समझौता कर के कुछ सैलरी पाने भी लगते हैं तो वो इतना थोड़ा होता है की शायद वो किसी को बताने में भी शर्मिंदगी महसूस करें... अगर खरी खरी और सच्ची बात करें तो आज पत्रकारिता नाम की कोई चीज रह ही नहीं गई है....आज लोग पत्रकारिता के नाम पर नौटंकी कर रहे हैं....हम ये नहीं कह सकते की पत्रकार की ये हालत हमेशा ऐसी ही थी...हॉ किसी जमाने में किसी पत्रकार के नाम पर लोग अपनी जगह से उठ खड़े होते थे लेकिन आज हालात काफी बदल गया है ....आज के दिन में पत्रकाररिता मतलब लोग शोषण समझते हैं और खुल कर पुछते हैं की क्या आपके ऑरगेनाइजेशन में इस तरह का कल्चर है....मीडिया , खास कर एलेक्ट्रॉनिक मीडिया के इस तरह बदलते हालात को देखर दिल काफी दुखता है, बहुत बुरा लगता है और एक बड़ा ही देसी कहावत याद आता है "'चिराग तले अंधेरा"मुझे पता है पत्रकारिता के इस बिगड़ैल मिजाज वाला बैलून फुटने की कगार पर है मुझे बस इंतजार है इसके फुटने का , मुझे ही क्या हर किसी को इंतजार है.... एक बार फिर पत्रकारिता के उस दौर का जब कोई पत्रकार अपनी कलम से क्रांती फैला दे ....मैं एक अदनानी सी पत्रकार अनिता चौधरी अपनी इस गुस्तीखी के लिए अपने साथी पत्रकारों से माफी भी मांगना चाहुंगी की अगर मैंने कुछ बड़वोलापन कर दिया हो तो मुझे माफ कर दें लेकिन साथ ही उनसे गुजारिश भी करुंगी की अपने कार्यक्षेत्र की सच्चाई को समझते हुए पत्रकारिता के उस दौर को दोबारा वापस लाने की मेरे इस मुहीम मेरी हौसलाफजाई करें .
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